कोर्ट ने महिला को दी 23वें हफ्ते में एबॉर्शन की मंजूरी, क्या दूसरी तिमाही में गर्भपात कराना सही है?

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जब एक महिला को पता चलता है कि वो प्रेगनेंट है, तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता है। उसे महसूस होता है कि उसके अंदर एक नई जिंदगी पल रही है और इसके आने पर उसकी भी पूरी जिंदगी बदल जाएगी। लेकिन कुछ महिलाओं के लिए यह खुशी दर्द से भरी हो सकती है और उन पलों की याद बन सकती है जो उनके लिए सबसे दर्दनाक रही हों। घरेलू या यौन हिंसा की शिकार हुई महिलाओं को अक्‍सर इस ट्रामा से गुजरना पड़ता है। जो महिलाएं घरेलू या यौन हिंसा झेल रही होती हैं, उनके लिए मां बनना और मुश्किलें लेकर आता है। जहां वो खुद अपनी जिंदगी को संभालने में असक्षम होती हैं, वहां वो बच्‍चे का पालन किस तरह कर पाएंगी।

पिछले साल अगस्‍त के महीने में बॉम्‍बे हाई कोर्ट ने घरेलू हिंसा की शिकार हुई एक पीडिता को 23वे हफ्ते में एबॉर्शन की अनुमति दी थी। अब आप सोच रहे होंगे कि इसमें नई बात क्‍या है, यदि कोई महिला बच्‍चा नहीं चाहती है तो वो अपनी मर्जी से एबॉर्शन करवा सकती है लेकिन ऐसा नहीं है। सरकार द्वारा गर्भपात की एक समय सीमा तय की गई है और यह समय बीत जाने के बाद कोई भी महिला कानून की अनुमति के बिना अपना एबॉर्शन नहीं करवा सकती है।

​क्‍या है कानून

भारत में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्‍नेंसी एक्‍ट यानि एमटीपी के अनुसार प्रेग्‍नेंसी के 20 से 24 हफ्ते के बाद कोई भी महिला गर्भपात नहीं करवा सकती है लेकिन अगर भ्रूण को कोई मेडिकल खतरा हो, तो वह एबॉर्शन करवा सकती है। हालांकि, इस महिला के केस में न तो बच्‍चे को कोई बीमारी थी और ना ही उसके जन्‍म लेने से मां की जान या सेहत को कोई खतरा था।

फोटो साभार : TOI

​क्‍या थी पीडिता की कहानी

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22 साल की एक महिला ने कोर्ट में अर्जी दायर की कि अगर वो अपनी प्रेग्‍नेंसी को आगे बढ़ाती है, तो इससे उसकी मानसिक स्थिति और ज्‍यादा खराब हो जाएगी। खबरों की मानें तो यह महिला लंबे समय से घरेलू हिंसा का शिकार हो रही थी और उसका मानना था कि अगर वो मां बन जाती है, तो इससे उसकी मानसिक और शारीरिक सेहत और ज्‍यादा बिगड़ जाएगी।

फोटो साभार : TOI

​महिला को थी बीमारी

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महिला को एबॉर्शन की अनुमति देने वाली टीम ने यह भी पाया कि पीडिता डिप्रेशन और एंग्‍जायटी से जूझ रही थी। ऐसे में बच्‍चे को जन्‍म देना और उसका पालन करना, उसके लिए काफी मुश्किल हो जाता।

फोटो साभार : TOI

​मुश्किल है फैसला

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किसी भी महिला के लिए गर्भपात एक दर्दनाक चीज होती है लेकिन कुछ महिलाओं के लिए प्रेग्‍नेंसी को बनाए रखना ज्‍यादा मुश्किल होता है। कोर्ट के इस फैसले से उन महिलाओं को मजबूती मिली है जो किसी कारणवश अपनी प्रेग्‍नेंसी को आगे नहीं बढ़ाना चाहती हैं।

फोटो साभार : TOI

​भारत में खराब हैं हालात

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लैंसेट आधारित अध्ययन के आंकड़ों से यह भी पता चला है कि अनचाहे गर्भधारण की दर भारत में सबसे अधिक बनी हुई है, जो साल 2015 में भारत में 15 से 49 आयु वर्ग की प्रति 1,000 महिलाओं पर लगभग 70 थी।

फोटो साभार : TOI

​क्‍या है एक्‍सपर्ट की राय

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स्वास्थ्य को लेकर जोखिमों के बावजूद, डॉक्टर और चिकित्सा विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि 24 सप्ताह के बाद गर्भपात बिल्कुल सुरक्षित है और यह बिल्कुल भी खतरनाक नहीं है। बढ़ती तकनीक के साथ, जटिलताएं या जोखिम भी कम हो गए हैं। इसके अलावा, यह याद रखना चाहिए कि गर्भपात पूरी तरह से एक व्यक्तिगत निर्णय है।

फोटो साभार : Mumbai Mirror

डॉक्‍टर का क्‍या है कहना

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दिल्‍ली के ग्रेटर कैलाश में निजी क्‍लीनिक चलाने वाली गायनेकोलॉजिस्‍ट डॉक्‍टर अर्चना नरुला का कहना है कि प्रेग्‍नेंसी के पहले तीन महीनों में गर्भपात करवाना ठीक रहता है क्‍योंकि इससे कम कॉम्प्लिकेशन होती हैं। हालांकि, कुछ कॉम्प्लिकेशंस ऐसी होती हैं जो प्रेग्‍नेंसी के आगे बढ़ने पर ही पता चल पाती हैं। ऐसे में गर्भपात करवाया जा सकता है। 20वे हफ्ते के बाद भी गर्भपात करवाने से स्‍वास्‍थ्‍य को कोई नुकसान नहीं होता है।

फोटो साभार : TOI

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