क्या इस बार भी गलत निकलेंगे चुनावी सर्वे?

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लेखकः अतनु बिस्वास
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आज आएंगे। इनमें राजनीतिक दलों के साथ ओपिनियन और एग्जिट पोल करने वालों का भी इम्तहान होगा। उन्होंने अलग-अलग पार्टियों को मिले वोट प्रतिशत और सीटों की संख्या की भविष्यवाणी की है। कुछेक मामलों में उनके आंकड़े एक दूसरे से अलग हैं तो कुछ में बिल्कुल उलट। इसे देखकर मेरे मन में यह सवाल उठा कि क्या ये लोग अपने सर्वे और उसके विश्लेषण में स्टैटिस्टिकल थिअरी और उसके सिद्धांतों पर अमल भी करते हैं?

कई बार गलत निकले
इसे समझने के लिए पहले उत्तर प्रदेश की मिसाल लेते हैं। 2017 विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 403 में से 312 सीटें हासिल कर यहां धमाकेदार जीत दर्ज की। तब ज्यादातर ओपिनियन पोल पार्टी की ऐसी जीत का अंदाजा नहीं लगा पाए थे। यहां तक कि अधिकतर एग्जिट पोल में भी बीजेपी को करीब 300 सीटें मिलने का दावा किया गया था। कुछ ने तो पार्टी को 150-160 सीटें ही दी थीं। इसी तरह से 2012 में समाजवादी पार्टी और 2007 में बीएसपी की जीत का अंदाजा लगाने से भी सर्वे चूक गए थे। पंजाब में भी अधिकतर ओपिनियन और एग्जिट पोल ने 2017 में कांग्रेस की संभावित कामयाबी को कम करके आंका था। राज्य में 2012 में शिरोमणि अकाली दल के साथ भी इन सर्वे में ऐसा ही किया गया था।

चुनावी सर्वे करने वाले अगर जीतने वाली पार्टी का सही अंदाजा लगा लेते हैं तो भी जीत के मार्जिन का ठीक अनुमान नहीं लगा पाते। वे इसे बहुत कम करके दिखाते हैं। हमारे यहां बहुदलीय लोकतंत्र है। इसमें 3-4 फीसदी के वोट मार्जिन पर जीतने वाली पार्टी को 70-80 फीसदी या इससे भी अधिक सीटें मिल सकती हैं, लेकिन सर्वे करने वाले जिन मॉडलों पर चलते हैं, उनमें वोट शेयर में इतने कम अंतर के असर का शायद खयाल नहीं किया जाता है। इसलिए अक्सर वे ‘लहर’ का अंदाजा नहीं लगा पाते।

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अभी पांच राज्यों में हुए चुनावों को लेकर भी यही हालत है। अगर इसमें बड़े सर्वे करने वालों के अनुमान को मिला दिया जाए तो अलग-अलग पार्टियों को मिलने वाली सीटों की रेंज में काफी अंतर दिखता है। एग्जिट पोल में जहां उत्तराखंड और गोवा में कड़ा मुकाबला दिखाया गया है, वहीं 117 सीटों वाले पंजाब में आम आदमी पार्टी (आप) की जीत का दावा किया गया है। हालांकि, एक सर्वे में आप को 56 सीटें दी गई हैं, जो दूसरे सर्वे की तुलना में 50 फीसदी कम हैं। दूसरी तरफ, एक सर्वे में तो आप को 100 सीटें मिलने का दावा किया गया है, जो कुल सीटों के 85 फीसदी से अधिक बैठता है।

इसी तरह, यूपी में बीजेपी को 326 से 211 के बीच सीटें मिलने की बात कही गई है। क्या सर्वे के आंकड़ों में इस अंतर का कोई मतलब बनता है? इसके लिए कुछ सवालों के जवाब मिलने चाहिए। किसी सर्वे में वोटरों से जो सवाल पूछे जाते हैं, उनसे मिलने वाले जवाब को पहले वोट शेयर में और फिर सीटों में कैसे बदला जाता है? यह सर्वे करने वालों की अपनी सोच पर कितना निर्भर करता है? असल में सर्वे के लिए जिन तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है, उनसे अनुमानित वोट शेयर में काफी अंतर आ सकता है। वोटरों की किसी पार्टी की पसंद को उसी अनुपात में वोट शेयर में बदलना शायद ठीक नहीं होगा। उन्हें इसमें कम प्रतिनिधित्व वाले समूहों को अधिक वेटेज देना होगा। इसके साथ वोटिंग हिस्ट्री के आधार पर उन्हें अलग-अलग समूहों के वोट डालने का भी अनुमान लगाना होगा।

अमेरिका में 2016 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले ‘न्यू यॉर्क टाइम्स’ की डेटा विजुअलाइजेशन-एनालिसिस वेबसाइट ‘दि अपशॉट’ ने सिएना कॉलेज, न्यू यॉर्क के साथ मिलकर फ्लोरिडा में एक सर्वे करवाया, जो पारंपरिक तौर पर कांटे की टक्कर वाला राज्य रहा है। 867 संभावित वोटरों के बीच करवाए गए इस सर्वे में डॉनल्ड ट्रंप के मुकाबले हिलेरी क्लिंटन एक फीसदी मार्जिन से आगे नजर आ रही थीं। ‘दि अपशॉट’ ने इसके बाद ये आंकड़े चार अलग-अलग सर्वे करने वालों के साथ शेयर किए और इनके आधार पर रिजल्ट की भविष्यवाणी करने को कहा।

सर्वे करने वालों ने अपने-अपने मॉडल के हिसाब से डेटा का विश्लेषण किया। इनमें से तीन ने क्रमश: 4 फीसदी, तीन फीसदी और 1 फीसदी के अंतर से क्लिंटन की जीत की भविष्यवाणी की। चौथे ने कहा कि 1 फीसदी के अंदर से ट्रंप जीतेंगे। इस तरह एक ही डेटा पर आधारित होने के बावजूद पांच अनुमानों में 5 फीसदी तक का अंतर पाया गया। अगर सर्वे करने वालों ने अपने लिए खुद आंकड़े इकट्ठा किए होते तो अंतर और ज्यादा होता। यह सोचकर दिमाग घूम जाता है कि अगर उन्हें भारत में सीटों की संख्या का अंदाजा लगाने को कहा जाता, तब क्या होता।

जाति, धर्म का पहलू
हमें मालूम है कि अमेरिका में सिर्फ दो बड़ी पार्टियां होने के बावजूद अलग-अलग नस्लों के कारण वोटिंग पैटर्न में काफी अंतर दिखता है। जाति और धर्म जैसे पहलू के कारण भारत में चुनाव नतीजों की भविष्यवाणी करना और मुश्किल हो जाता है। यहां तक कि अलग-अलग पार्टियों को मिलने वाले वोट शेयर भी ज्यादातर अनुमानों में बिखरे हुए नजर आते हैं। इसलिए वोटों के आधार पर सीटों का अनुमान लगाना यहां बहुत मुश्किल हो जाता है। वोटों से सीटों तक पहुंचने की प्रक्रिया एक रैखिक नहीं होती। इसमें कई तरह के फैक्टर काम करते हैं। इनमें से कई तो इस कदर स्थानीय प्रकृति के होते हैं कि चुनाव क्षेत्र विशेष तक सीमित रहते हैं। अपना-अपना एग्जिट पोल तैयार करने वाले अपनी भविष्यवाणियों में अलग-अलग तरीकों से इन विविधताओं का खयाल रखते हैं। यानी कुल मिलाकर देखें तो कहा जा सकता है कि ईवीएम खुलने का रोमांच अभी कम नहीं होने जा रहा।

(लेखक इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टिट्यूट, कोलकाता में स्टैटिस्टिक्स प्रॉसेसर हैं)

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं



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