मोदी के मुकाबले पवार क्यों खड़े नहीं हुए

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लेखकः अवधेश कुमार
एनसीपी प्रमुख शरद पवार का यह बयान वैसे तो सामान्य है कि वह मोदी या बीजेपी विरोधी किसी गठबंधन का नेतृत्व नहीं करेंगे लेकिन गठबंधन बनता है तो मदद करेंगे, लेकिन मौजूदा माहौल में इस पर ध्यान देने की जरूरत है। अनेक विरोधी नेता सत्ता से बीजेपी को हटाना चाहते हैं, पर नेतृत्व की दावेदारी से बचते हैं। क्यों? उन्हें नरेंद्र मोदी को लेकर जनता की सोच का धीरे-धीरे एहसास हो गया है। चुनाव चाहे केंद्र का हो या राज्य का या स्थानीय निकाय का, मोदी बड़े मुद्दे के रूप में सर्वत्र उपस्थित हैं। यह असाधारण स्थिति है, जो पिछले छह दशकों से ज्यादा समय से नहीं देखी गई।

मोदी की लोकप्रियता भारी पड़ी
आखिर मोदी में ऐसा क्या है, जिससे ऐसी स्थिति पैदा हुई? थोड़ी गहराई से देखें तो नजर आएगा कि नरेंद्र मोदी जब केंद्रीय सत्ता की दावेदारी में सामने आए थे, तब उनके पक्ष और विपक्ष दोनों में लहर की स्थिति थी। पिछले आठ वर्षों में विरोध की लहर कमजोर हुई और पक्ष की मजबूत। कुछ वर्ष पहले आप जहां जाते, मोदी समर्थकों के साथ विरोधी भी उसी आक्रामकता से सामने आते थे। आज मोदी का विरोध होता है, लेकिन उसमें वैसी आक्रामकता और वैसा संख्या बल नहीं है। ज्यादातर विरोध औपचारिक होकर रह गया है। यह स्थिति देश में ही नहीं, विदेश में भी है। एक नेता, जिसे देश और विदेश के विरोधियों ने महाखलनायक बना कर पेश किया, वह धीरे-धीरे अपने कार्यों और भाषणों से इतनी बड़ी संख्या में लोगों का हृदय बदलने में कामयाब हुआ है तो इसे असाधारण परिवर्तन कहना ही मुनासिब होगा।

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शरद पवार ने मोदी या बीजेपी विरोधी गठबंधन का नेतृत्व करने से किया इनकार (फाइल फोटो)

पांच राज्यों के हालिया विधानसभा चुनावों में आप जहां भी जाते, मोदी का नाम सबसे ज्यादा सुनने को मिलता। ऐसे मतदाताओं की संख्या काफी थी, जो कह रहे थे कि इस चुनाव में हम बीजेपी को वोट नहीं देंगे। लेकिन 2024 में मोदी हैं इसलिए उनके समर्थन में वोट जाएगा ही। इसका अर्थ यही है कि विधानसभा चुनाव में अगर किसी राज्य में बीजेपी का ग्राफ नीचे हुआ है तो उससे 2024 के अंकगणित का आकलन करना नासमझी होगी।

विरोधियों की समस्या है कि वे हमेशा नरेंद्र मोदी का आकलन अपनी एकपक्षीय विचारधारा के चश्मे से करते हैं और यहीं विफल हो जाते हैं। आप देश के किसी भी आदिवासी मोहल्ले में चले जाइए और पूछिए कि किसे वोट दोगे तो बिना सोचे स्त्री-पुरुष सब बोलेंगे कि मोदी को। उन सबकी आवाज ऐसी मुखर होती है कि जिन्हें मोदी के आविर्भाव के बाद समाज के मनोविज्ञान में आए परिवर्तनों का आभास न हो, वे दंग रह जाएंगे। दूसरी ओर आप बुद्धिजीवियों, पेशेवरों, वैज्ञानिकों, सैनिकों, किसानों, मजदूरों, कारीगरों, टैक्सी चालकों, रिक्शा चालकों आदि के बीच जाएं तो उनके मुंह से भी मोदी समर्थन की आवाज निकलती है।

उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान यादव समूह मुख्यतः समाजवादी पार्टी के पक्ष में था। लेकिन उनमें भी ऐसे लोग मिलते थे, जो कहते थे कि मैं तो मोदी का समर्थन करना चाहता हूं लेकिन माहौल ऐसा है कि मेरा वोट माना ही नहीं जाएगा। एक सेना का नौजवान यादव मुझे मिला जिसने कहा कि मैं मोदीवादी हूं, क्योंकि मुझे मालूम है सेना और रक्षा के लिए उन्होंने क्या किया है, किंतु हमको समाजवादी पार्टी समर्थक बना दिया गया है। यह उदाहरण इतना स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है कि मोदी किस तरह उनके भी चहेते हैं जिनकी अपनी निश्चित दलीय निष्ठा या विचारधारा नहीं है।

ऐसा नहीं है कि दलीय और वैचारिक दायरे से बाहर के इन लोगों का समर्थन पाने के लिए मोदी ने हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की विचारधारा पर किसी तरह से समझौता किया। इसके उलट, उन्होंने हिंदुत्व और राष्ट्रवाद पर ज्यादा स्पष्ट और मुखर होते हुए आम आदमी के कल्याण, विकास की सोच और विदेश व रक्षा नीति के बीच संतुलन बनाया है। मोदी को हिंदुत्व का हीरो मानने वाले उनसे प्रसन्न हैं तो देश की सुरक्षा, विकास और विदेश में भारत की धाक जमाने की उम्मीद करने वाले भी संतुष्ट हैं। जिन्हें विरोध करना है वे भले स्वीकार न करें, देश और विदेश का बहुमत इसे स्वीकार करता है। जरा सोचिए, विपक्ष महंगाई का मुद्दा उठाता है तो भारी संख्या में लोग कहते हैं कि हम महंगा तेल लेंगे, लेकिन वोट मोदी को ही देंगे। ये सारे लोग अज्ञानी नहीं हैं। ऐसा भी नहीं कि उनकी जेबों पर महंगाई का दबाव नहीं पड़ता। इस हद तक जाकर मोदी का समर्थन करने के पीछे उनका यह विश्वास है कि देश और हम मोदी के हाथों ज्यादा सुरक्षित हैं। आलोचक कहते हैं कि मोदी भाषण अच्छा देते हैं और लोगों को सम्मोहित कर लेते हैं। थोथे शब्दों से कोई इतने लंबे समय तक जनता का ऐसा विश्वास हासिल नहीं कर सकता।

आखिर समाज के निचले तबके से लेकर ऊपर तक, अनपढ़ से बुद्धिजीवियों तक और सामान्य कारीगर, रिक्शा चालक से लेकर वैज्ञानिक, नौकरशाह और विदेश के भारतवंशी तक- सब मोदी के बारे में इतनी सकारात्मक धारणा क्यों रखते हैं, इसका गहराई से अध्ययन किया जाए तो उत्तर मिल जाता है। सोचिए इसके पहले किस प्रधानमंत्री ने ‘मन की बात’ में ऐसे छोटे-छोटे मुद्दों और विषयों को उठाया! परीक्षा पर चर्चा करते और छात्रों के प्रश्नों का विस्तार से उत्तर देते हुए कौन नेता देखा गया! अनुच्छेद 370 हटाने के कट्टर समर्थक भी कल्पना नहीं करते थे कि अपनी जिंदगी में वे इसे साकार होते देखेंगे। अयोध्या में मंदिर निर्माण हो ही जाएगा, इसकी भी कल्पना नहीं थी।

विरासत नहीं, काबिलियत
ऐसा नहीं है कि मोदी को एक सुगठित और सशक्त बीजेपी विरासत में मिली थी। अंतर्कलह का शिकार और तेजी से लोकप्रियता खोती पार्टी ही मिली थी। पार्टी को संभालना, उसे विचारधारा की पटरी पर लौटाना, क्षमायाचना की मुद्रा से बाहर ले आना और सबके साथ सरकार में देश के अंदर और बाहर संतुलन बनाते हुए नेतृत्व करना- मोदी की असाधारण प्रतिभा का प्रमाण है। विपक्ष में ऐसी असाधारण प्रतिभा वाला कोई नेतृत्व सामने आए तभी लगेगा कि मोदी को वास्तविक चुनौती मिली है।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं



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